अंतराल
अंतराल
प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के सफर में सुख- दुख के खट्टे - मीठे अनुभवों से गुज़रना ही पड़ता है। 'गुज़रना' शब्द यहाँ विशेष है क्योंकि इसी शब्द के पीछे छिपा है वैयक्तिक प्रगति का सारा कार्य - व्यापार।
इसे कार्य- व्यापार कहें या रहस्य परंतु मानव- जीवन में इसकी महति भूमिका दिखाई पड़ती है ।वास्तव में 'गुज़रना' शब्द के दो आधार हमें दिखाई पड़ते हैं - एक 'गुज़रना' अकर्मक क्रिया की भूमिका निभाता है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति को अनचाहे भी बचपन से वृद्धावस्था तक का अपना सफर पूरा करना होता है। अपने इस सफर में उसे कई प्रकार की लहरों का सामना करना पड सकता है या उसकी खुशकिस्मती उसके हिस्से मे अमूल्य रत्नो के भंडार भी प्रदान कर सकती है । कहने का आशय यह है कि जीवन तो गुजरना ही है, क्यों न हम उसे अपनी इच्छा से अपने तमाम लक्ष्यों और उद्देश्यों को पूरा करने में गुजारें ।
धनानंद एक निम्न- मध्यम वर्गीय परिवार का संचालक था । पत्नी, तीन पुत्रियों और दो पुत्र- रत्नो की संपदा के साथ वह परिश्रमपूर्वक जीवन- यापन कर रहा था । परिवार भी धनानंद की भाँति परिश्रमी था। सभी मिलकर यहाँ- वहाँ का छोटा - मोटा काम कर घनानंद का भार हलका करने की कोशिश करते । इस प्रकार वे अपने दिन गुजार रहे थे । निःसंदेह इस जीवनचर्या में लक्ष्य- निर्धारण और शतप्रतिशत प्रतिफल पाने की न तो कोई कामना थी, न लक्ष्य ही।
सीता, गीता और दुलारी नामक उनकी बेटियाँ अपनी रूचि के आधार पर गायन, पाक- कला और तीरंदाजी का भी अभ्यास कर लेतीं । प्रतिदिन के निरंतर अभ्यास नें उनकी कला में निपुणता ला दी थी । उधर मोहन और सोहन नामक दोनों बेटे घर की समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर के
आपसी झगड़ों में उलझे रहते । माता- पिता घर की जरूरतें पूरी करने और बड़ी बहनें घर के काम - काज और माता- पिता के कार्य में हाथ बँटाने के बाद अपने अभ्यास - कार्य में जुट जातीं । उनके परिश्रम के फलस्वरूप ही तीनों बेटियों की अच्छी नौकरी लग गई।
बेटियों नें जब माता- पिता का भार हलका करने की कोशिश की तो स्वाभिमानी धनानंद नें घर- खर्च के लिए पैसे लेने से इंकार करते हुए यह सलाह दी कि इस धन को अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए सुरक्षित रखे । कुछ ही समय में उनके रूप, गुण आदि के कारण अच्छे रिश्ते आने लगे और उनकी पसंद से योग्य वर के साथ धनानंद ने उनके हाथ पीले कर सुखी जीवन का आशीर्वाद देकर विदा कर दिया । अब धनानंद के जीवन का बड़ा भार हलका तो हुआ था, परंतु अब भी दोनों बेटों में सामंजस्य स्थापित करना और भाईचारे की भावना बढाना चाहता था ।
अब धनानंद नें तरकारी- भाजी की अपनी पटरी पर लड़कों को बिठाकर बारी -बारी से उनसे काम लेकर मार्गदर्शन करना शुरू किया ही था कि उसका बड़ा बेटा छत से गिरने के कारण अधमरा हो गया । सभी स्थानीय डॉक्टरों नें जवाब दे दिया, परंतु दृड़ निश्चयी धनानंद ने हार न मानी। उसके शरीर से उखड़ती हुई अंतिम साँसों को थामने की कोशिश मे उसने लखनऊ महानगर के बड़े अस्पताल में अपने अधमरे बेटे को दाखिल करवाने की हर- संभव कोशिश की । धन की कमी और जान- पहचान के अभाव के कारण इतने बड़े अस्पताल में उसे ठोंकरों और निराशा के कुछ हाथ नहीं लग रहा था। निरंतर हाथ लगती असफलता के कारण वह टूट चुका था, परंतु अब भी अपने इष्ट पर उसका विश्वास कायम था शायद इसी विश्वास के बूते ही आज मुख्य चिकित्सा अधिकारी नें उसकी समस्या दूर करने का भरोसा दिलाया था ।
उपचार की प्रक्रिया शुरी हुई तो धनानंद का ईश्वर और दुनिया पर विश्वास कायम हुआ । 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत- यह उक्ति भी पुरूषार्थियों का ही साथ देती है। अंतिम क्षणों तक
संघर्षरत रहने वाला वीर ही जंग का विजेता बनता है , यह बात चरितार्थ होती दिख रही थी। बालक को कष्ट से गुजरना तो पड़ा, परंतु परिणाम सुखद रहा। धनानंद और उसकी पत्नी ने बच्चे की ऐसी सेवा की कि कुछ महीनों में ही पूर्ववत हो उद्देश्य प्राप्ति में यों जुटा कि बड़े सरकारी अधिकारी का पद पाया। छोटा बेटा भी उसी की लीक पर चल अधिकारी बना । धूप - छाँव की भाँति आने वाले कष्ट वास्तव में सुखद क्षणों के आते ही छोटे हो जाते हैं।
तो क्या धनानंद नें आजीवन अपने दायित्त्वो: के पालन में कोई कमी की थी? क्या स्वाभिमानी धनानंद बच्चों की सफलता के बाद उनके साथ रहता होगा?
क्या घनानंद और उसकी पत्नी द्वारा बच्चों के लालन- पालन में कोई कमी दिखाई देती है ?
आपकी दृष्टि से एक पिता का क्या दायित्त्व होना चाहिए, क्या धानानंद उस कसौटी पर खरा उतर सका?
इस कहानी के माध्यम से आपके मन में कौन से प्रश्न उत्पन्न हुए ?
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क्या आप कहानी के शिर्षक से सहमत है, इस संबंध में अपनी राय अवश्य दें।
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